93 साल के गुरु जी दाऊद
खान रामायणी
# पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर

दाऊद खान रामायणी, रामचरित मानस का पाठ करते हैं। उन्हें जानने वाले प्यार से उन्हें गुरु
जी कहकर पुकारते हैं। बच्चे उन्हें चॉक्लेट वाले दादाजी के नाम से जानते हैं।
क्योंकि उनके सामने गुजरने वाले बच्चे हों या बड़े सबको वह चॉक्लेट जरूर देते हैं।
आज वह इस 93 साल के उम्र में भी फिट हैं और रोज सुबह प्रातः भ्रमण पर ज़रूर जाते
हैं।
लेकिन यहाँ पर हम गुरु जी
दाऊद खान के और एक पहलू के बारे में चर्चा करने, जानने और
समझने की कोशिश करेंगे। गुरु जी आज जितने लोकप्रिय हैं वह एक शिक्षक के बतौर अपने
समय में उतने ही लोकप्रिय थे। और इसकी वजह भी है।
“ इस स्कूल के गेट के
दोनों ओर गेंदा के फूल के पौधा होता था, ऐसा लगता था मानो
आपको गार्ड ऑफ आनर दे रहा हो। यहाँ बागवानी भरापूरा था,
जिसमें बैंगन , मिर्च, धनिया, मेथी के अलावा कई फलदार वृक्ष भी था जिसमें काजू भी था। यह सब दाऊद खान
गुरुजी का प्रयास था ।” यह कहना है उनके साथ सहायक शिक्षक के रूप में काम कर चुके
शिक्षक शिव प्रसाद सारवान का जो अभी भी उसी लोहरसी माध्यमिक शाला में शिक्षक हैं
जहां दाऊद जी वहाँ के प्राथमिक शाला में सन 63 से सन 83 तक 20 साल रहे । दोनों
स्कूल एक ही अहाता में है।
दाऊद जी से जब इस संबंध में
बात हुई की उन्होने यह सब कैसे किया था ? इस पर उनका जवाब
था की “ यह सबसे महत्वपूर्ण है की लोगों के साथ संबंध कैसा था ? संबंध खराब होगा तो बना बनाया बिगड़ जाएगा, संबंध
अच्छा होगा तो बिगड़ा हुआ बन जाएगा। जब हम वहाँ पहुंचे तो जो पाठशाला थी वह इमारत
थी, तो सबसे पहले हमारे आत्मा में आया की इसका परकोटा (
चारदीवारी ) चाहिए। तो दो/ढाई एकड़ का प्लाट है। उसमें परकोटा बनाना है, 5 फीट साढ़े 5 फीट ऊंचाईं का। इसके लिए हमने रामायण का कार्यक्रम रखा।
सबको मालूम था की दाऊद खान गुरु जी आरहे हैं जो रामायण पढ़ते हैं। चार बार हमने
रामायण किया और कहा की आपका रामायण पढ़ने या सुनने से कुछ नहीं होगा, बल्कि रामायण जो कहती है वैसा आचरण बनाने से होगा। आपका स्कूल देखो, दो एकड़ के प्लाट में बना हुआ है और रात में गाय-बैल वहाँ घुसे रहते हैं, और सुबह गोबर फेंकना पड़ता है। इसमें अगर परकोटा बन जाता तो बहुत अच्छी
बात होती। भगवान राम ने जहां जहां कुटिया बनाई, परकोटा
बनाया। सीता, राम और लक्ष्मण तीनों मिलके परकोटा बनाए हैं
रामायण में। खाली राजा बनकर वह नहीं गए थे, सेवक बनकर गए थे
राम।” हमने उनको बताया, तो वहाँ मिस्त्री थे, ईंटा जोड़ने वाले, फ्री में जोड़ा, वहाँ ईटा बनाने वाले थे फ्री में दिया। सीमेंट फ्री में मिला। बताओ दो
एकड़ का 6 फीट दीवाल, अंदाज़ लगाओ कितनी ईंट लगी होगी ? हमारा एक पैसा खर्च नहीं हुआ। अगर पैसा खर्च हुआ होता तो उस जमाने में भी
कम से कम बीस हज़ार रुपये खर्च हुए होते। जो सहयोग में फोकट में होगया। सहयोग की
परिभाषा समझानी नहीं पड़ी। आपस में अगर आदमी का प्रेम हो जाये, तो कठिन से कठिन कार्य सरल हो जाता है। और जहां खींचतान हो वहाँ सरल
कार्य भी कठिन हो जाता है। यह प्रक्टिकल करके लोग सीख गए। ”

उसके पहले वह खरेंगा
प्राथमिक शाला में भी पदस्थ थे। खरेंगा के अनुभव के बारे में उनका कहना है की “ खरेंगा
में सबसे बड़ा काम हमने ये किया की, महानदी का पानी
धूपकाले में सुख जाता था, पानी के लिए वह गाँव तरसता था, तो हमने एक ही दिन में 10 फीट ऊँचा बालू का एक चेक डैम बनवा दिया जिसके
उपर में एक फीट चौड़ा रास्ता था जिसमें लोग चल सकते थे। इस तरह से 10 फीट ऊंचे डैम
में 9 फीट पानी भरा था। बस्ती वालों के सामने बहुत बड़ा काम हुआ। जैसा जलाशय आगया, जो बूंद बूंद के केलिए तरसते थे, नदी को खोद के
जिसे झरिया बोलते हैं न? उसका पानी डूम डूम के पीते थे, वहाँ इतना पानी, खरेंगा से अछोटा तक लबालब पानी। और
यह सिर्फ एक दिन में तैयार होगया । इसमें पूरी पब्लिक भीड़ गई न, सबका स्वार्थ था, बूंद बूंद के लिए तरसते थे। हमने
उनसे कहा की अगर आप दिन भर भीड़ गए तो पूरे गाँव नदी क्या समूद्र बन सकता है।
नदी को बांध कर प्रक्टिकल
देखा उन्होने, की सच मुच, जो गुरुजी ने
कहा वह सच है। इस तरह से कोई भी चीज असंभव नहीं है, किसमें ? संगठन में, किस में ? प्रेम
में, और मेरे पास 2 चीजें है, प्यार
करता हूँ और लोगों को लोगों से जोड़ता हूँ।
इस तरह से इन कामों के
कारण ही 1972 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला। वी वी गिरि उस समय राष्ट्रपति थे, उन्होने फ़र्स्ट क्लास की टिकिट भेजी और पूरा इंतज़ाम किया, मैं राष्ट्रपति भवन में आठ दिन मेहमान रहा और राष्ट्रपति भवन में हमारा
प्रवचन हुआ। राष्ट्रपति ने पूछा की हम आपको पुरस्कार दे रहे हैं, आप क्या महसूस कर रहे हैं, हमने कहा, दाऊद खान जगत पति से पुरस्कृत है और आज राष्ट्रपति से पुरस्कार ले रहा
है। ”
हम लोहरसी में वह स्कूल गए
थे, आज वहाँ न तो बागवानी है और न स्कूल में अहाता। पर उस अहाते के अवशेष आज भी
कहीं कहीं दिखाई दे रहे हैं। दाऊद गुरु जी उस दौरान स्कूल में कई पेड़ भी लगवाए थे
जिनमें से कई पेड़ बड़े और बूढ़े हो चुके हैं और कई पेड़ अब नहीं है। वह गाँव वालों को
उत्साहित कर लोगों के हाथ से पेड़ लगवाए थे ।
“ हरेक पेड़ में गाँव के
सयानों का नाम चिपका दिये थे, इस पेड़ में इनका नाम था लिखा है उस पेड़ में
उनका नाम है, उस से वो सब बहुत खुश थे । प्यार बेटा बहुत असर
करता है। ईमानदारी से काम करना है, पुछने की कोई जरूरत नहीं
है वह तो भीतर तक असर करता है। वह तो तब होगा जब व्यवहार में परिवर्तन लाओगे तभी
उसका असर होगा। ”- दाऊद जी ने कहा।
केवल
स्कूल को सजाने और संवारने में समय व्यतित नहीं करते थे बल्कि शिक्षा पर भी ध्यान
केन्द्रित करते थे। उनके सहयोगी शिव जी का कहना है –“ दाऊद गुरुजी स्कूल में बहुत
ही व्यस्त रहते थे। अध्यापन , बागवानी और बुनियादी शिक्षा
पर भी ध्यान रखते थे। इन सबके साथ वह प्रधान पाठक होते हुए भी हर दिन तीन क्लास
लेते थे। ”
दाऊद गुरुजी का गाँव वालों से
कैसा संबंध था यह इस बात से अंदाज़ा लगाई जा सकती है की जब हमने उस समय के एक
बुजुर्ग अमर सिंह साहू से पूछा तो उनका कहना था- “ ओ गुरु जी के बारे में काला
बताओं,ओखर कस गुरुजी तो संसार में नई ये।”
purusottam25@gmail.com
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