जिन मुश्किलों का सामना मैंने किया है वह इन्हें करना ना पड़े – महेंद्र कुमरा बोरझा
* पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर
महेंद्र कुमार बोरझा अपने बाईक से उतरते ही सीधे उस क्लास रूम में पहुँचते हैं जहां करीब 50 छात्र-छात्राएं उनका इंतज़ार कर रहे थे। छात्र-छात्राएं शिक्षक महेंद्र कुमार के पहुँचते ही अभिवादन करते हैं, और महेंद्र उनसे 7 मिनट देरी से पहुंचने पर माफी मांगते हुए अपना इंग्लिश लर्निंग का क्लास शुरू करदेते हैं।
यूं तो यह कक्षा जहां लगी है वह शासकीय माध्यमिक शाला, बोडरा जो की छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले के आदिवासी विकास खंड नगरी में स्थित है। छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर से तकरीबन
160 किमी दूर आदिवासी बहुल इस बोडरा गाँव और आसपास के गाँव के कक्षा 9 वीं से लेकर स्नातक तक के बच्चे उसमें शामिल हैं । ये सब महेंद्र कुमार से इंग्लिश सीखने आते हैं।
महेंद्र कुमार इस स्कूल में पिछले 4 साल से प्रधान शिक्षक हैं, और स्कूल का समय है सुबह 9 बजे लेकिन वह घर से साढ़े 7 से बजे घर से निकलते हैं और स्कूल में 8 बजे से पहले पहुँच जाते हैं। और 8 से 9 बजे तक इंग्लिश क्लास लेते हैं । और 9 बजे ये सारे बच्चे चले जाते हैं तब तक उनके स्कूल के बच्चे पहुँच चुके होते हैं । इस तरह से इस स्कूल का प्रधान शिक्षक सबसे पुराने छात्रछात्राओं का क्लास लेते हैं। आखिर इसके पीछे उनका मक़सद क्या है ? वह क्यों इतना मसक्कत कर रहे हैं ? न तो शासन की ओर से कोई आदेश है और न उन्हें इसके एवज में कोई पैसा मिलने वाला है !
“ इसके पीछे मेरा सोच यह है की हम एक छात्र के बतौर और बाद में नौकरी आदि के क्षेत्र में जिन मुश्किलों का सामना किया है खासतौर पर इंग्लिश को लेकर उसका सामना कम से कम इन बच्चों को करना ना पड़े। क्योंकि आज सभी क्षेत्र में इंग्लिश जानना जरूरी हो गया है। चाहे उच्च शिक्षा का क्षेत्र हो या नौकरी या व्यापार का सभी में इसकी ज़रूरत है “ यह कहना है महेंद्र कुमार का। और यह शिक्षा वह मुफ्त में दे रहे हैं। अपने इस कर्मक्षेत्र में शिक्षा का स्तर को सुधारने में लगे यह शिक्षक खुद भी एक आदिवासी हैं ।
“ हम यहाँ इंग्लिश और इंग्लिश ग्रामर सीखने आते हैं। जो हमारे लिए बहुत जरूरी है “ यह कहना है फुलेश्वरी यादव का जो BSc प्रथम वर्ष की छात्रा हैं । वहीं इस इंग्लिश लर्निंग की विद्यार्थी ऐश्वर्या सेन का कहना है “ हमें इंग्लिश व्याकरण कुछ भी नहीं आता है, जो अब लगतार अभ्यास के बाद समझ में आने लगा है।
महेंद्र कुमार बोरझा जब 4 साल पहले इस स्कूल में आए तब यहाँ स्कूल के नाम पर एक सिर्फ एक बिल्डिंग और एक शौचालय था। लेकिन अब स्कूल के चारों ओर बाउंड्री वाल बन चुका है, बाउंड्री वाल के अंदर जो हैंड पम्प था उसमें अब मोटर पम्प लगचुका है, और नलजल की व्यवस्था हो गई है और इसमें से निकालने वाले नाली के पानी को यहाँ फल, फूल और सब्जी के बगीचे में उपयोग किया जा रहा है।
“ हमारा स्कूल आसपास के स्कूलों से थोड़ा अलग है, यहाँ हमारे बैठने के लिए डेस्क बेंच हैं, लाइब्ररी है और यहाँ पढ़ाई भी अच्छी होती है।” – यह कहना है 8 वीं के छात्रा रोशनी का।
स्कूल के स्वीपर जीके कश्यप का मानना है की -“ यह सब बदलाव के पीछे हमारे हैड मास्टर हैं, जो स्कूल के विकास के लिए लगे रहते हैं। और वह न केवल हमें और स्कूल के बच्चों को बल्कि गाँव के लोगों को भी प्रेरित करते रहते हैं।” यहाँ पर गौरतलब है की महेंद्र कुमार अपने प्रधान पाठक के कक्ष में ही अन्य शिक्षकों और यहाँ तक के स्कूल के सफाई कर्मचारी और चतुर्थश्रेणी कर्मचारी के साथ बैठते हैं और उनके भी नाम का प्लेट उन कर्मचारियों के टेबल में रखा हुआ है।
“ जब मैं पहलीबार यहाँ आया तब स्कूल में मूलभूत व्यवस्था का अभाव था। स्कूल के विकास के लिए गाँव वालों की बैठक करना चाहा तो पता चला गाँव दो हिस्से में बंटे हुए हैं तब मैंने ठान ली की पहले गाँव वालों को एक जुट करना है। इसलिए बाकायदा आज़ादी का जश्न मनाने से पहले सब को निमंत्रण पत्र दिया गया। गाँव वाले इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिए।
हमने 2013-14 में नलजल योजना के लिए गाँव वालों ने करीब 50,000 रुपये इकठ्ठा कर लिए और नल जल व्यवस्था को अंजाम दिया। इस वर्ष लोगों से पैसे नहीं बल्कि श्रमदान लिया गया जिसके चलते मैदान का समतलिकरण, एक प्लैटफ़ार्म आदि गाँव वालों ने किया। आज स्कूल के बगीचे में फूल के पौधे, फलों के पेड़ और शाग-सब्जी उगाये गए हैं। और इन पेड़ पौधों का देखरेख स्कूल के सभी छात्र-छात्राएं और शिक्षक मिलकर करते हैं।
यही नहीं यहाँ कई आयोजन खास तरीके से किया जाता है जैसे 3 दिवसीय वार्षिक उत्सव। जिसमें पहले रोज़ खेलकूद का आयोजन, दूसरे दिन विज्ञान प्रदर्शनी और तीसरे दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम।”
“ छात्रछात्राओं को भी राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करते रहे हैं जिसके चलते पिछले साल 5 से 3 छात्र-छात्राएं राष्ट्रीय मेधावी अन्वेषण परीक्षा में पास हुए हैं जिन्हें कक्षा 12 वीं तक महीने में 500 रुपये स्कोलारशिप मिलेगा।
और उनका इस तरह का प्रयास सिर्फ स्कूल के चारदीवारी तक सीमित नहीं है, वह गाँव के उन बड़े और बुजुर्गों तक को पढ़ने लिखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं जिसके चलते पिछले साल 11 में से 10 लोग मुक्त विदद्यालय के जरिये इम्तहान में बैठे और पास हुए हैं।
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