बुधवार, 28 दिसंबर 2016

Garden of Foundation

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गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

गाँव से जुड़ने मोदीमाटवाडा स्कूल ने किया और एक पहल पालकों के लिए भी शौचालय का दरवाजा खोला

गाँव से जुड़ने मोदीमाटवाडा स्कूल ने किया और एक पहल
पालकों के लिए भी शौचालय का दरवाजा खोला
एक स्कूल ग्रामीणों के ज़िंदगी से किस तरह से जुड़ सकता है और अपनी ओर से क्या क्या पहल कर सकता है इसका और उदाहरण प्रस्तुत किया है छत्तीसगढ़ राज्य के कांकेर जिले के एक प्राथमिक शाला ने. उस प्राथमिक शाला का नाम है शासकीय प्राथमिक शाला मोदी-माटवाडा जो कांकेर शहर से ३ किमी दूर स्थित है.
देश के प्रधानमंत्री स्वच्छता अभियान को बढ़ावा देने के लिए तरह तरह के कार्यक्रम की ना केवल शुरूआत कर चुके हैं बल्कि देश भर में इसे लेकर कई तरह के प्रयोग भी हो रहे हैं. जिसके अंतर्गत सभी गाँव में और सब के घर शौचालय निर्माण के लिए जोरशोर से प्रयास जारी है और ऐसा ही प्रयास तक़रीबन 500 लोगों की आबादी वाली मोदी-माटवाडा गाँव में भी जारी है. इस प्रयास के चलते ज्यादातर लोगों के घरों में शौचालय का निर्माण भी हो चूका है पर कुछ के घरों में अभी भी बाकी है. दूसरी ओर जिनके घरों में शौचालय निर्माण नहीं हुआ है उनके उपर काफी दबाव है . गाँव में न केवल बड़े  बल्कि बच्चे भी उन लोगों पर नज़र रख रहे हैं जो शौच के लिए बाहर जा रहे हैं. इस समस्या से निजात पाने के लिए गाँव के प्राथमिक शाला
के प्रधान शिक्षिका अनसूया जैन ने भी हर बार की तरह इस बार भी एक पहल किया है- “ जब हम पूरे गाँव को एक परिवार मानते हैं और जब परिवार के कुछ लोगों के घर अभी शौचालय नहीं हैं तो वह बाहर क्यों जाएँ ? इसलिए हमने अपने सहयोगिओं और बच्चों के साथ बात करके यह  पहल की है. जिसके तहत यह तय किया गया है की जब तक इन लोगों के घर में शौचालय निर्माण नहीं हो पाया है तब तक वह स्कूल के शौचालय का प्रयोग कर सकते हैं. और तब से पिछले 15 दिनों से वार्ड नंबर 1 और 4 से करीब 10-15 महिलायें और पुरुष यहाँ का शौचालय का प्रयोग कर रहे हैं.”
गौरतलब है की इस स्कूल के शौचालय की साफ़ सफाई और रख रखाव देखने लायक है. इस शौचालय में ओवर हेड टैंक भी है जहाँ हर वक़्त पानी की व्यवस्था है, हाथ धोने के लिए लिक्विड साबुन का भी इंतज़ाम है !
स्कूल के और दो शिक्षिका साईरा बानो खान और अराधना चितरैया का भी सहयोग के बिना तो यह सब काम संभव ही नहीं हैं. उनका स्कूल इस साल जिले में स्वच्छ स्कूल के रूप में भी चुना गया है और राज्य में भी इस स्कूल का नाम भेजा गया है.  
मोदीमाटवाडा के सरपंच गणेश ध्रुव का कहना है- “ शौचालय निर्माण के अंतर्गत ज्यादातर शौचालय का निर्माण हो चूका है. और कुछ बाकि है जो जल्द पूरा हो जाएगा ऐसे में स्कूल के इस पहल से हमारा काम आसान हो गया है और इसके लिए हम स्कूल के आभारी हैं. और यह स्कूल और इसके शिक्षक गाँव के विकास में विशेष योगदान देते रहे हैं.”
इस तरह से इस प्राथमिक शाला की प्रधान पाठिका अनसूया जैन गाँव वालों के हर सुख दुःख में अपने आपको और स्कूल को जोड़े रखती हैं जिसके चलते गाँव वालों, पंचायत का और सबसे ज्यादा पालकों का सहयोग स्कूल को बराबर मिलता रहता है जिससे स्कूल में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लिए माहौल खुद ब खुद बन जाता है और स्कूल और गाँव एक दुसरे के विकास बराबरी के हिस्सेदार नज़र आते हैं.
# मोदी माटवाडा प्राथमिक शाला से लौटकर पुरूषोत्तम सिंह ठाकुर
साथिओं आप को अनसूया जैन और उनके स्कूल की कहानी पहले भी कई बार शेयर कर चूका हूँ और यह कई जगह प्रकाशित भी होचुका है, एक लिंक नीचे दे रहा हूँ. एक कहानी तो हमारे
“ सपनों की उड़ान पुस्तिका में भी प्रकाशित है .

बुधवार, 14 सितंबर 2016

जहां दाऊद गाता है रामचरित मानस..

जहां दाऊद गाता है रामचरित मानस..

  • 7 अप्रैल 2016
Image copyrightGETTY
छत्तीसगढ़ के धमतरी में 93 साल के दाऊद ख़ां 'रामायणी' का नाम बड़े अदब से लिया जाता है. दाऊद ख़ां रामचरित मानस का पाठ करते हैं, इसलिए उनके नाम के साथ 'रामायणी' जुड़ गया है.
जानने और चाहने वाले उन्हें प्यार से गुरुजी कहकर पुकारते हैं. सेवानिवृत्त सरकारी शिक्षक दाऊद ख़ां बहुत लोकप्रिय और कर्मठ शिक्षक रहे हैं.
वे आज भी हर सुबह नियमित तौर पर टहलने जाते हैं. बच्चे उन्हें 'चॉकलेट वाले दादा जी' कहते हैं क्योंकि वो बच्चे हों या बड़े सबको चॉकलेट देते हैं.
रामायण से उनका संबंध कब और कैसे बना, इस पर वे कहते हैं, "जब मैं शिक्षक ट्रेनिंग स्कूल में भर्ती हुआ तो मुझे वहां सालिगराम द्विवेदी और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मिले. ये दो मेरे शिक्षक थे. मुझे उनका सत्संग मिला."
वह कहते हैं, "तीन साल की ट्रेनिंग थी. तीसरे साल इलाहाबाद विश्वविद्यालय की 'रामायण रत्न' परीक्षा दी और हिंदुस्तान भर में प्रथम आया. 13 रुपए का पुरस्कार मिला. उसके बाद लोगों की दया और भगवान की कृपा से मेरा झुकाव रामायण के प्रति हो गया. इस तरह 68 साल से मैं रामचरित मानस का प्रवचन कर रहा हूँ."
दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR
प्रशिक्षण लेने के बाद दाऊद ख़ां शिक्षक बन गए. वे जिस स्कूल में भी रहे, वहां के ग्रामीणों से संबंध स्थापित किया. इसमें रामायण ने अहम भूमिका निभाई.
रामायण के ज़रिए उन्होंने स्कूल के साथ-साथ गांव के विकास के लिए भी लोगों को प्रेरित किया.
लोहरसी में तैनाती के दौरान उन्होंने गाँव वालों की मदद से स्कूल की चारदीवारी बनवाई और स्कूल में पेड़ लगवाए. उनमें से कुछ आज भी मौजूद हैं.
उन्होंने बताया, "हमने रामायण का कार्यक्रम रखा. सबको मालूम था कि दाऊद ख़ां गुरु जी आ रहे हैं, जो रामायण पढ़ते हैं. चार बार हमने रामायण पाठ किया. इसके बाद कहा कि आपके रामायण पढ़ने से कुछ नहीं होगा, बल्कि रामायण जो कहती है, वैसा आचरण करने से होगा."
दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR
इसी कार्यक्रम में उन्होंने गांव वालों से कहा कि, "स्कूल दो एकड़ में है. सुबह वहां से गोबर फेंकना पड़ता है. अगर चारदीवारी बन जाए, तो बहुत अच्छी बात हो. भगवान राम ने जहां भी कुटिया बनाई, अहाता ज़रूर बनाया."
उनकी अपील पर लोगों ने बिना मेहनताने के काम किया. ईंट और सीमेंट का दान किया. इस तरह स्कूल की छह फ़ीट उंची चारदीवारी बनी.
दाऊद ख़ां बताते हैं कि उन्हें लोगों को सहयोग की परिभाषा समझानी नहीं पड़ी. उनके मुताबिक़ अगर इंसान का आपस में प्रेम हो, तो कठिन से कठिन कार्य सरल हो जाता है.
इस तरह आठ अलग-अलग कामों के लिए उन्हें 1972 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला. तब राष्ट्रपति वीवी गिरि के बुलावे पर दाऊद दिल्ली गए और आठ दिन राष्ट्रपति के मेहमान रहे. उन्होंने राष्ट्रपति भवन में प्रवचन भी किया.
दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR
दाऊद बताते हैं, "राष्ट्रपति ने पूछा, हम आपको पुरस्कार दे रहे हैं, आप कैसा महसूस कर रहे हैं? हमने कहा, दाऊद ख़ां जगतपति से पुरस्कृत है और आज राष्ट्रपति से पुरस्कार ले रहा है."
हालांकि कट्टरपंथी मुसलमानों ने उनके रामायण पाठ पर आपत्ति जताई और उनसे यह काम छोड़ने को कहा. इस पर उन्होंने, "चलो मान लो, मैं छोड़ देता हूँ पर रामायण ने मुझे जिस तरह पकड़ लिया है, उसका क्या?"
दाउद ख़ां आज भी सक्रिय हैं लेकिन अब बहुत कम जगह रामायण पाठ करने जाते हैं.
हाल ही में वे छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग के एक कार्यक्रम में गए थे. वहां से उन्हें जो भी पैसा मिला, वह उन्होंने उस लड़की को पढ़ाई के लिए दे दिया, जो पहले उनके यहां काम करती थी.
दाऊद ख़ां ने उसे पढ़ने को प्रेरित किया था और आज वह सिविल सेवा की तैयारी कर रही है.
दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR
कार्यक्रम से मिलने वाले पैसे का दाऊद ख़ां अपने लिए इस्तेमाल नहीं करते. वह अब तक 19 लोगों की पढ़ाई करवा चुके हैं.
घर में अकेले रहने वाले दाऊद पेंशन के सात हज़ार रुपए में ही गुज़ारा करते हैं. आज भी सुबह-शाम उनके घर लोगों का आना-जाना लगा रहता है, जो उनसे चर्चा के लिए आते हैं.
दाऊद कहते हैं, "इस तरह से कोई भी चीज़ असंभव नहीं संगठन में, प्रेम में. मेरे पास दो चीज़ें है, प्यार करता हूँ और लोगों को लोगों से जोड़ता हूँ."

जहां दाऊद गाता है रामचरित मानस..

जहां दाऊद गाता है रामचरित मानस..

  • 7 अप्रैल 2016

Image copyrightGETTY

छत्तीसगढ़ के धमतरी में 93 साल के दाऊद ख़ां 'रामायणी' का नाम बड़े अदब से लिया जाता है. दाऊद ख़ां रामचरित मानस का पाठ करते हैं, इसलिए उनके नाम के साथ 'रामायणी' जुड़ गया है.
जानने और चाहने वाले उन्हें प्यार से गुरुजी कहकर पुकारते हैं. सेवानिवृत्त सरकारी शिक्षक दाऊद ख़ां बहुत लोकप्रिय और कर्मठ शिक्षक रहे हैं.
वे आज भी हर सुबह नियमित तौर पर टहलने जाते हैं. बच्चे उन्हें 'चॉकलेट वाले दादा जी' कहते हैं क्योंकि वो बच्चे हों या बड़े सबको चॉकलेट देते हैं.
रामायण से उनका संबंध कब और कैसे बना, इस पर वे कहते हैं, "जब मैं शिक्षक ट्रेनिंग स्कूल में भर्ती हुआ तो मुझे वहां सालिगराम द्विवेदी और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मिले. ये दो मेरे शिक्षक थे. मुझे उनका सत्संग मिला."
वह कहते हैं, "तीन साल की ट्रेनिंग थी. तीसरे साल इलाहाबाद विश्वविद्यालय की 'रामायण रत्न' परीक्षा दी और हिंदुस्तान भर में प्रथम आया. 13 रुपए का पुरस्कार मिला. उसके बाद लोगों की दया और भगवान की कृपा से मेरा झुकाव रामायण के प्रति हो गया. इस तरह 68 साल से मैं रामचरित मानस का प्रवचन कर रहा हूँ."

दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR

प्रशिक्षण लेने के बाद दाऊद ख़ां शिक्षक बन गए. वे जिस स्कूल में भी रहे, वहां के ग्रामीणों से संबंध स्थापित किया. इसमें रामायण ने अहम भूमिका निभाई.
रामायण के ज़रिए उन्होंने स्कूल के साथ-साथ गांव के विकास के लिए भी लोगों को प्रेरित किया.
लोहरसी में तैनाती के दौरान उन्होंने गाँव वालों की मदद से स्कूल की चारदीवारी बनवाई और स्कूल में पेड़ लगवाए. उनमें से कुछ आज भी मौजूद हैं.
उन्होंने बताया, "हमने रामायण का कार्यक्रम रखा. सबको मालूम था कि दाऊद ख़ां गुरु जी आ रहे हैं, जो रामायण पढ़ते हैं. चार बार हमने रामायण पाठ किया. इसके बाद कहा कि आपके रामायण पढ़ने से कुछ नहीं होगा, बल्कि रामायण जो कहती है, वैसा आचरण करने से होगा."

दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR

इसी कार्यक्रम में उन्होंने गांव वालों से कहा कि, "स्कूल दो एकड़ में है. सुबह वहां से गोबर फेंकना पड़ता है. अगर चारदीवारी बन जाए, तो बहुत अच्छी बात हो. भगवान राम ने जहां भी कुटिया बनाई, अहाता ज़रूर बनाया."
उनकी अपील पर लोगों ने बिना मेहनताने के काम किया. ईंट और सीमेंट का दान किया. इस तरह स्कूल की छह फ़ीट उंची चारदीवारी बनी.
दाऊद ख़ां बताते हैं कि उन्हें लोगों को सहयोग की परिभाषा समझानी नहीं पड़ी. उनके मुताबिक़ अगर इंसान का आपस में प्रेम हो, तो कठिन से कठिन कार्य सरल हो जाता है.
इस तरह आठ अलग-अलग कामों के लिए उन्हें 1972 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला. तब राष्ट्रपति वीवी गिरि के बुलावे पर दाऊद दिल्ली गए और आठ दिन राष्ट्रपति के मेहमान रहे. उन्होंने राष्ट्रपति भवन में प्रवचन भी किया.

दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR

दाऊद बताते हैं, "राष्ट्रपति ने पूछा, हम आपको पुरस्कार दे रहे हैं, आप कैसा महसूस कर रहे हैं? हमने कहा, दाऊद ख़ां जगतपति से पुरस्कृत है और आज राष्ट्रपति से पुरस्कार ले रहा है."
हालांकि कट्टरपंथी मुसलमानों ने उनके रामायण पाठ पर आपत्ति जताई और उनसे यह काम छोड़ने को कहा. इस पर उन्होंने, "चलो मान लो, मैं छोड़ देता हूँ पर रामायण ने मुझे जिस तरह पकड़ लिया है, उसका क्या?"
दाउद ख़ां आज भी सक्रिय हैं लेकिन अब बहुत कम जगह रामायण पाठ करने जाते हैं.
हाल ही में वे छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग के एक कार्यक्रम में गए थे. वहां से उन्हें जो भी पैसा मिला, वह उन्होंने उस लड़की को पढ़ाई के लिए दे दिया, जो पहले उनके यहां काम करती थी.
दाऊद ख़ां ने उसे पढ़ने को प्रेरित किया था और आज वह सिविल सेवा की तैयारी कर रही है.

दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR

कार्यक्रम से मिलने वाले पैसे का दाऊद ख़ां अपने लिए इस्तेमाल नहीं करते. वह अब तक 19 लोगों की पढ़ाई करवा चुके हैं.
घर में अकेले रहने वाले दाऊद पेंशन के सात हज़ार रुपए में ही गुज़ारा करते हैं. आज भी सुबह-शाम उनके घर लोगों का आना-जाना लगा रहता है, जो उनसे चर्चा के लिए आते हैं.
दाऊद कहते हैं, "इस तरह से कोई भी चीज़ असंभव नहीं संगठन में, प्रेम में. मेरे पास दो चीज़ें है, प्यार करता हूँ और लोगों को लोगों से जोड़ता हूँ."

आज सावित्री बाई फुले ज्यादा प्रासंगिक हैं.



 “ हाँ मैं सावित्री बाई फुले ” का भाखरा,खिसोरा और नगरी समेत छत्तीसगढ़ में ६ जगह मंचन

आज सावित्री बाई फुले ज्यादा प्रासंगिक हैं. 







धमतरी,14 सितम्बर, 2016।
देश की पहली महिला शिक्षिका होने का श्रेय सावित्री बाई फुले को जाता है. लेकिन दुःख कि बात है कि आज आम आदमी तो आम आदमी शिक्षा के क्षेत्र के भी ज्यादतर लोग उनके योगदान और जीवन संघर्ष के बारे में नहीं जानते हैं.
आज हम ऐसे महापुरुषों का पूजा करना, और जन्मदिन मना लेते हैं पर उनके बातों पर अमल करना नहीं चाहते हैं. जब कि वह समस्याएं और उन समस्याओं को चुनौतिओं कि तरह लेना आज बहुत जरूरी है. इसलिए आज सावित्री बाई फुले ज्यादा प्रासंगिक हो गई हैं.
आज से सवा सौ साल से भी ज्यादा समय पहले बालिका शिक्षा के क्षेत्र में काम करनेवाली सावित्रीबाई फुले के साथ साथ आज देश में उनके पति ज्योतिबा फुले जैसे पुरुषों की भी ज्यादा जरूरत है। यह बात एकल नाट्य प्रस्तुति “ हाँ मैं सावित्रीबाई फुले ” के मंचन में ना केवल देखने को मिला बल्कि मंचन के बाद दर्शकों से सवाल जवाब के माध्यम से रूबरू हुए नाट्यकारलेखिकाऔर निर्देशिका सुषमा देशपांडे से बातचीत में साफ झलकता नज़र आया।

गौर तलब है कि सुषमा जी पिछले एक हफ्ते से छत्तीसगढ़ के दौरे पर हैं और अब तक बेमेतरा, भाटापारा, शिवरीनारायण और धमतरी जिले में नगरी, खिसोरा और आज भाखरा में इस एकल नाटक का मंचन हुआ. अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन और डाइट जैसे संस्थाओं के साथ मिलके इसका आयोजन किया गया जिसमें छात्र अध्यापक, शिक्षक, शिक्षिका और बुद्धिजीवी शामिल हुए.
इस नाटक का लेखन, निर्देशन और मंचन देश के जाने माने रंगकर्मी सुषमा देशपांडे ने किया. नाटक की शुरुआत वह कुछ यूं करती हैं ...जिसमें 19 वीं शताब्दी की सावित्रीबाई फुले आज हमारे बीच आती हैं और दर्शकों से सीधे बतिआने लगती हैं. अपने बारे में अपने समय के बारे में, लड़किओं के सामाजिक और शिक्षा कि स्थिति के बारे में दलितों के हालात के बारे में बात करती हैं और दर्शकों से कहती हैं कि हम जब उस समय यह सब कर पाए तो आज क्यों यह असंभव है ? आप को भी समाज के बुराईयोँ से लड़ना चाहिए.

सावित्रीबाई की जीवन बहुत ही नाटकीय हैजिसे उन्होने बहुत ही सहज भाव से और नवरस के मिश्रण से जबर्दस्त प्रस्तुति में तब्दील करते हुए दर्शकों को बाँधें रखने में कामयाब होती हैं। 
यही वजह है की मंचन के बाद जब सवाल जवाब का सेशन शुरू होता है तो उसमें दर्शक मुखर होगयेउन्होने न केवल मंचन की प्रशंशा की बल्कि बहुत ही गंभीर सवाल किए जिसका नाट्यकार सुषमा देशपांडे ने उतनी ही गंभीरता के साथ जवाब दिया।  
अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालयऔर अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस नाट्य प्रस्तुति सुषमा जी पिछले 28 सालों में तीन हज़ार से ज्यादा बार मंचन करचुकी हैं। 
# पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर 

शनिवार, 3 सितंबर 2016

कब बदलेगा मेरा गाँव का स्कूल ?

 

कब बदलेगा मेरा गाँव का स्कूल ?

                                                                                   
                                                                                                 Pix by  Purusottam25@gmail.com
कब बदलेगा मेरा गाँव का स्कूल ?

सरकार बदल रही है, ताज बदल रहा है,

देश बदल रहा है, दुनिया बदल रहा है

क्यों नहीं बदल रहा मेरा गाँव का स्कूल ?

पहले एक शिक्षक आते थे, आज भी एक ही आते हैं,

( पर वह शिक्षक नहीं शिक्षा कर्मी आते हैं ! )

कब बदलेगा मेरे गाँव का स्कूल ?

पहले हम भी आते थे नंगे पाँव, 20 साल बाद भी

मेरे गाँव के बच्चे अब भी आते हैं नंगे पाँव ?

कब बदलेगा ? और कौन बदलेगा मेरा गाँव का स्कूल ?

मेरे गाँव के बच्चों के अधिकार सुरक्षित करने के लिए

शिक्षा का अधिकार, बच्चों का अधिकार, एन सी एफ -2005

और न जाने क्या क्या लागू हो चुका है,

पर न जाने क्यों नहीं बदल रहा है मेरा गाँव का स्कूल !

कब बदलेगा मेरा गाँव का स्कूल  ?

- पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर

शनिवार, 23 जुलाई 2016

ओलंपिक जाना चाहता है बुधिया

ओलंपिक जाना चाहता है बुधिया

  • 22 जुलाई 2016
फ़िल्म 'बुधिया सिंह: बॉर्न टू रन', पांच अगस्त को रिलीज़ होने वाली है. यह ओडिशा के नन्हें मैराथन धावक बुधिया सिंह पर आधारित है. फ़िल्म के साथ बुधिया सिंह एक बार फिर चर्चा में हैं.
चर्चा के बीच ख़बर आई कि बुधिया सिंह भुवनेश्वर के स्पोर्ट्स हॉस्टल से गायब हैं. वह वहां 2007 से रह रहे हैं और डीएवी पब्लिक स्कूल में पढ़ाई करते हैं.
इस पर खुर्दा की जिला बाल कल्याण कमेटी ने शनिवार को पुलिस से बुधिया सिंह के ग़ायब होने की शिकायत की. इस पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 363 के तहत अपहरण का मामला दर्ज किया.
लेकिन अब ख़बर आई है कि बुधिया और उनकी माँ कोडाईकनाल में छुट्टियां मना रहे हैं.

चार साल की उम्र में पुरी से भुवनेश्वर की दूरी तय करते बुधिया. Image copyrightPURUSOTTAM THAKUR

भुवनेश्वर के पुलिस आयुक्त वाईवी खुरानिया ने इसकी पुष्टि की.
उन्होंने कहा, "रविवार दोपहर मेरी बुधिया और उनकी माँ सुकांति सिंह से बात हुई. उन्होंने कहा कि वो अपनी मर्जी से कोडाईकनाल आए हुए हैं. वहां वो आसपास घूम रहे हैं और कोई समस्या नहीं है. वे दोनों 24-25 जुलाई को मुंबई होते हुए वापस आएंगे."
जानकारी मिली है कि बुधिया और उनकी माँ के घूमने-फिरने का इंतजाम फ़िल्म की प्रमोशन और मार्केटिंग टीम ने किया है. लेकिन इस बारे में जब फिल्म के निर्देशक सौमेंद्र पाढ़ी से उनके मोबाइल नंबर पर संपर्क करने की कोशिश की गई तो उन्होंने फ़ोन ही नहीं उठाया.
हॉस्टल खुलने से पहले बुधिया ने बीबीसी से कहा था. "बचपन में जैसे मैं मैराथन दौड़ता था, वैसे ही आज भी दौड़ना चाहता हूँ, मेरे गुरु जी बिरंची सर मुझे जैसे मैराथन दौड़ने का ट्रेनिंग दे रहे थे. मैं चाहता हूँ कि उनकी ही तरह मुझे कोई मैराथन का ट्रेनिंग दे."

अपने घर में मां के साथ बुधिया सिंह.Image copyrightPURUSOTTAM THAKUR

उन्होंने कहा था, "बिरंची सर चाहते थे कि मैं ओलंपिक जाऊं और देश का नाम रोशन करूँ. मैं बिरंची सर के सपने को पूरा करना चाहता हूँ. मेरा पूरा परिवार भी चाहता है कि मैं ओलंपिक में जाऊं और देश का नाम करूँ."
बुधिया को हॉस्टल में अच्छा प्रशिक्षण न मिलने की शिकायत है.
उन्होंने कहा, "हॉस्टल में थोड़ी-थोड़ी ट्रेनिंग देते हैं, जो अच्छी नहीं लगती. कहते हैं कि ज्यादा दौड़ोगे तो ये हो जाएगा, वो हो जाएगा. वहां ठीक से ट्रेनिंग नहीं देते हैं."
इस वजह से बुधिया हॉस्टल में नहीं रहना चाहते हैं. उनका कहना कि स्कूल के टाइमिंग की वजह से सुबह प्रैक्टिस के लिए केवल एक घंटा ही मिलता है और शाम को केवल दो घंटा.
इस शिकायत पर स्पोर्ट्स हॉस्टल भुवनेश्वर के इंचार्ज और बुधिया के कोच रूपंविता पांडा ने बीबीसी से कहा, "एथलेटिक फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के मुताबिक मैराथन दौड़ने के लिए एक तयशुदा उम्र है. बुधिया की उम्र अभी केवल 14 साल 5 महीने है, जबकि मिनी मैराथन के लिए भी 15 साल की उम्र ज़रूरी है. मिनी मैराथन 2,000 मीटर की होती है और मैराथन में 42 किमी की. हम नियमों को नज़रंदाज़ कैसे कर सकते हैं?"

खेलों की मशाल जलाते बुधिया.Image copyrightPURUSOTTAM THAKUR

बुधिया सिंह ने 2006 में चार साल की आयु में पुरी से भुवनेश्वर तक की क़रीब 63 किमी की दूरी दौड़ कर पूरी की थी. इससे वो दुनिया भर में मशहूर हो गए थे.
दौड़ के आखिर में उनकी जो हालत हुई थी, उसके बाद से यह दौड़ भी विवादास्पद हो गई थी.
जिला बाल कल्याण कमेटी की सुझाव पर राज्य सरकार ने कम उम्र के बावजूद बुधिया को स्पोर्ट्स हॉस्टल भेज दिया था. वो तबसे वहीं रह रहे हैं.
वो भुवनेश्वर के डीएवी इंग्लिश मीडियम पब्लिक स्कूल में नौंवी कक्षा के छात्र हैं.
मैराथन के लिए बुधिया को बिरंची जैसे किसी कोच की तलाश है. इस वजह से वो हॉस्टल नहीं जाना चाहते हैं. वहीं उनकी मां का कहना था कि कोच की व्यवस्था होने तक बुधिया को हॉस्टल जाना चाहिए.
बुधिया के परिवार में उनकी माँ के अलावा तीन बहनें हैं. वो भुवनेश्वर के झोपड़पट्टी सालिया साही में रहती हैं.

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ बुधिया.Image copyrightPURUSOTTAM THAKUR

'बुधिया सिंह: बोर्न टू रन' को इस साल का राष्ट्रीय बाल पुरस्कार मिल चुका है. यह फ़िल्म पांच अगस्त को रिलीज़ होने वाली है.
बिरंची की पत्नी गीता पंडा ने उम्मीद जताई कि फिल्म के रिलीज़ होने के बाद बुधिया के अधूरे सपने भी पूरे होंगे.
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