आज सावित्री बाई फुले ज्यादा प्रासंगिक हैं.
धमतरी,14 सितम्बर, 2016।
देश की पहली महिला शिक्षिका होने का श्रेय सावित्री बाई फुले को जाता है. लेकिन दुःख कि बात है कि आज आम आदमी तो आम आदमी शिक्षा के क्षेत्र के भी ज्यादतर लोग उनके योगदान और जीवन संघर्ष के बारे में नहीं जानते हैं.
आज हम ऐसे महापुरुषों का पूजा करना, और जन्मदिन मना लेते हैं पर उनके बातों पर अमल करना नहीं चाहते हैं. जब कि वह समस्याएं और उन समस्याओं को चुनौतिओं कि तरह लेना आज बहुत जरूरी है. इसलिए आज सावित्री बाई फुले ज्यादा प्रासंगिक हो गई हैं.
आज से सवा सौ साल से भी ज्यादा समय पहले बालिका शिक्षा के क्षेत्र में काम करनेवाली सावित्रीबाई फुले के साथ साथ आज देश में उनके पति ज्योतिबा फुले जैसे पुरुषों की भी ज्यादा जरूरत है। यह बात एकल नाट्य प्रस्तुति “ हाँ मैं सावित्रीबाई फुले ” के मंचन में ना केवल देखने को मिला बल्कि मंचन के बाद दर्शकों से सवाल जवाब के माध्यम से रूबरू हुए नाट्यकार, लेखिका, और निर्देशिका सुषमा देशपांडे से बातचीत में साफ झलकता नज़र आया।
गौर तलब है कि सुषमा जी पिछले एक हफ्ते से छत्तीसगढ़ के दौरे पर हैं और अब तक बेमेतरा, भाटापारा, शिवरीनारायण और धमतरी जिले में नगरी, खिसोरा और आज भाखरा में इस एकल नाटक का मंचन हुआ. अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन और डाइट जैसे संस्थाओं के साथ मिलके इसका आयोजन किया गया जिसमें छात्र अध्यापक, शिक्षक, शिक्षिका और बुद्धिजीवी शामिल हुए.
इस नाटक का लेखन, निर्देशन और मंचन देश के जाने माने रंगकर्मी सुषमा देशपांडे ने किया. नाटक की शुरुआत वह कुछ यूं करती हैं ...जिसमें 19 वीं शताब्दी की सावित्रीबाई फुले आज हमारे बीच आती हैं और दर्शकों से सीधे बतिआने लगती हैं. अपने बारे में अपने समय के बारे में, लड़किओं के सामाजिक और शिक्षा कि स्थिति के बारे में दलितों के हालात के बारे में बात करती हैं और दर्शकों से कहती हैं कि हम जब उस समय यह सब कर पाए तो आज क्यों यह असंभव है ? आप को भी समाज के बुराईयोँ से लड़ना चाहिए.
सावित्रीबाई की जीवन बहुत ही नाटकीय है, जिसे उन्होने बहुत ही सहज भाव से और नवरस के मिश्रण से जबर्दस्त प्रस्तुति में तब्दील करते हुए दर्शकों को बाँधें रखने में कामयाब होती हैं।
यही वजह है की मंचन के बाद जब सवाल जवाब का सेशन शुरू होता है तो उसमें दर्शक मुखर होगये, उन्होने न केवल मंचन की प्रशंशा की बल्कि बहुत ही गंभीर सवाल किए जिसका नाट्यकार सुषमा देशपांडे ने उतनी ही गंभीरता के साथ जवाब दिया।
अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, और अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस नाट्य प्रस्तुति सुषमा जी पिछले 28 सालों में तीन हज़ार से ज्यादा बार मंचन करचुकी हैं।
# पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर
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