जहां दाऊद गाता है रामचरित मानस..
- 7 अप्रैल 2016
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छत्तीसगढ़ के धमतरी में 93 साल के दाऊद ख़ां 'रामायणी' का नाम बड़े अदब से लिया जाता है. दाऊद ख़ां रामचरित मानस का पाठ करते हैं, इसलिए उनके नाम के साथ 'रामायणी' जुड़ गया है.
जानने और चाहने वाले उन्हें प्यार से गुरुजी कहकर पुकारते हैं. सेवानिवृत्त सरकारी शिक्षक दाऊद ख़ां बहुत लोकप्रिय और कर्मठ शिक्षक रहे हैं.
वे आज भी हर सुबह नियमित तौर पर टहलने जाते हैं. बच्चे उन्हें 'चॉकलेट वाले दादा जी' कहते हैं क्योंकि वो बच्चे हों या बड़े सबको चॉकलेट देते हैं.
रामायण से उनका संबंध कब और कैसे बना, इस पर वे कहते हैं, "जब मैं शिक्षक ट्रेनिंग स्कूल में भर्ती हुआ तो मुझे वहां सालिगराम द्विवेदी और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मिले. ये दो मेरे शिक्षक थे. मुझे उनका सत्संग मिला."
वह कहते हैं, "तीन साल की ट्रेनिंग थी. तीसरे साल इलाहाबाद विश्वविद्यालय की 'रामायण रत्न' परीक्षा दी और हिंदुस्तान भर में प्रथम आया. 13 रुपए का पुरस्कार मिला. उसके बाद लोगों की दया और भगवान की कृपा से मेरा झुकाव रामायण के प्रति हो गया. इस तरह 68 साल से मैं रामचरित मानस का प्रवचन कर रहा हूँ."
PURUSOTTAM SINGH THAKUR
प्रशिक्षण लेने के बाद दाऊद ख़ां शिक्षक बन गए. वे जिस स्कूल में भी रहे, वहां के ग्रामीणों से संबंध स्थापित किया. इसमें रामायण ने अहम भूमिका निभाई.
रामायण के ज़रिए उन्होंने स्कूल के साथ-साथ गांव के विकास के लिए भी लोगों को प्रेरित किया.
लोहरसी में तैनाती के दौरान उन्होंने गाँव वालों की मदद से स्कूल की चारदीवारी बनवाई और स्कूल में पेड़ लगवाए. उनमें से कुछ आज भी मौजूद हैं.
उन्होंने बताया, "हमने रामायण का कार्यक्रम रखा. सबको मालूम था कि दाऊद ख़ां गुरु जी आ रहे हैं, जो रामायण पढ़ते हैं. चार बार हमने रामायण पाठ किया. इसके बाद कहा कि आपके रामायण पढ़ने से कुछ नहीं होगा, बल्कि रामायण जो कहती है, वैसा आचरण करने से होगा."
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इसी कार्यक्रम में उन्होंने गांव वालों से कहा कि, "स्कूल दो एकड़ में है. सुबह वहां से गोबर फेंकना पड़ता है. अगर चारदीवारी बन जाए, तो बहुत अच्छी बात हो. भगवान राम ने जहां भी कुटिया बनाई, अहाता ज़रूर बनाया."
उनकी अपील पर लोगों ने बिना मेहनताने के काम किया. ईंट और सीमेंट का दान किया. इस तरह स्कूल की छह फ़ीट उंची चारदीवारी बनी.
दाऊद ख़ां बताते हैं कि उन्हें लोगों को सहयोग की परिभाषा समझानी नहीं पड़ी. उनके मुताबिक़ अगर इंसान का आपस में प्रेम हो, तो कठिन से कठिन कार्य सरल हो जाता है.
इस तरह आठ अलग-अलग कामों के लिए उन्हें 1972 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला. तब राष्ट्रपति वीवी गिरि के बुलावे पर दाऊद दिल्ली गए और आठ दिन राष्ट्रपति के मेहमान रहे. उन्होंने राष्ट्रपति भवन में प्रवचन भी किया.
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दाऊद बताते हैं, "राष्ट्रपति ने पूछा, हम आपको पुरस्कार दे रहे हैं, आप कैसा महसूस कर रहे हैं? हमने कहा, दाऊद ख़ां जगतपति से पुरस्कृत है और आज राष्ट्रपति से पुरस्कार ले रहा है."
हालांकि कट्टरपंथी मुसलमानों ने उनके रामायण पाठ पर आपत्ति जताई और उनसे यह काम छोड़ने को कहा. इस पर उन्होंने, "चलो मान लो, मैं छोड़ देता हूँ पर रामायण ने मुझे जिस तरह पकड़ लिया है, उसका क्या?"
दाउद ख़ां आज भी सक्रिय हैं लेकिन अब बहुत कम जगह रामायण पाठ करने जाते हैं.
हाल ही में वे छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग के एक कार्यक्रम में गए थे. वहां से उन्हें जो भी पैसा मिला, वह उन्होंने उस लड़की को पढ़ाई के लिए दे दिया, जो पहले उनके यहां काम करती थी.
दाऊद ख़ां ने उसे पढ़ने को प्रेरित किया था और आज वह सिविल सेवा की तैयारी कर रही है.
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कार्यक्रम से मिलने वाले पैसे का दाऊद ख़ां अपने लिए इस्तेमाल नहीं करते. वह अब तक 19 लोगों की पढ़ाई करवा चुके हैं.
घर में अकेले रहने वाले दाऊद पेंशन के सात हज़ार रुपए में ही गुज़ारा करते हैं. आज भी सुबह-शाम उनके घर लोगों का आना-जाना लगा रहता है, जो उनसे चर्चा के लिए आते हैं.
दाऊद कहते हैं, "इस तरह से कोई भी चीज़ असंभव नहीं संगठन में, प्रेम में. मेरे पास दो चीज़ें है, प्यार करता हूँ और लोगों को लोगों से जोड़ता हूँ."
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