राजनान्दगाँव ज़िले के पिछड़े हुए विकासखंड का एक गाँव है मटकशा। गोंड और हलवा आदिवासियों के यह गाँव भी बाकी आदिवासी गाँवों की तरह ही विकास में पीछे छूटा हुआ है। पर इस गाँव की एक एक बात मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित किया वह है गाँव के सुंद्री बाई, मैत्री बाई, देवारिन, दुखुराम और नरसुराम के 5 बुजुर्गों की टोली जो बकरी चराते हैं। इनकी उम्र 60 से लेकर 75 साल की होगी। ये सभी आदिवासी हैं।
ये रोज बकरियों का एक झुंड लेकर सुबह 10/11 बजे निकलते हैं और दोपहर ढाई या 3 बजे के करीब वापास आते हैं।
जब उनसे बात हुई की वह इस उम्र में क्यों बकरी चराते हैं तो नरसुराम ने कहा, " अब ताकत कम हो चुका है, खेती किसानी कर नहीं सकते इसलिए घर में बैठने के बजाए यह काम कर रहे हैं।
सुन्द्री बाई ने कहा की छोटे बच्चे स्कूल जाते हैं, जवान लोग खेती करते हैं इसलिए हम यह काम कर रहे हैं।
कब से कर रहे हैं ? इस पर उन्होने जवाब दिया की पहले घर में बकरी नहीं था, एक दो होता था जिसे जंगली जानवर खा जाते थे, इसलिए अब हम मिलकर बकरी पाल भी रहे हैं और चरा भी रहे हैं।
जब चराने जाते हैं तो गप भी मारते होंगे ? इस पर हँसते हुए मैत्री बाई ने कहा " हाँ जब बकरी चरते होते हैं तो बैठ के गप मारते हैं लेकिन बकरी इधर उधर भागते हैं तो लड़ भी लेते हैं और बकरियों के पीछे भागते हैं।
बकरी बेचते भी हैं ? तो उन्होने कहा, जब जरूरत होती है बकरी बेच कर कर जरूरत पूरा भी करते हैं।
आप लोगों को निराश्रित पेंशन मिलता है ? इसपर सब जवाब देते हैं, कई बार नाम लिखकर लेगये हैं पर अभीतक नहीं मिला ! और उन्होने पूछा हमें क्यों नहीं मिल रहा है और कब मिलेगा ?
पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर
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