कल यानी 31 जनवरी को खैरागढ़ आते आते राजनान्दगाँव से पहले इन यायावर समुदाय को देखा। ये मध्य प्रदेश के सागर ज़िले से हैं। उनमें से एक सुमेर सिंह से मुलाक़ात हुई जो अपनी पत्नी के साथ लोहे का औज़ार बना रहे थे। ये सभी लोहार हैं जो बर्षात के चार महीने छोडके बाकी समय देश भर में यू ही घूम घूम के लोहे का औज़ार बनाते हैं और जहां रहते हैं वहाँ और आसपास के बाज़ार में जाके बेचते हैं। ये ज़्यादातर कृषि से संबन्धित औज़ार बनाते हैं।
एक बात दुख की यह है की न तो इनके पूरखे और न ये और तो और इनके बच्चे कभी स्कूल गए और ना जाने की संभावना दिखाई देती है। पुछने से कहते हैं की उनके गाँव में न खेती है औटर न दूसरा कमाई का जरिया तो वह घर में रहके बच्चों को पढ़ा पाएंगे। उन्होने कहा सरकार से कहिए न हमें ज़मीन दे ताकि हम खेती करें और बच्चों को पढ़ाएँ। अब पता नहीं सरकार क्यों इस पर ध्यान नहीं दे रही है ।
दूसरी ओर ये बहुत ही मेहनतकश लोग हैं और महिलाएं तो बहुत ही दोहरी ज़िम्मेदारी निभाते हुए दिखाई देते हैं जैसे पानी लाना, खाना बनाना , बच्चों को सम्हालना, लोहार काम में मदद करना और सामान ले जाके बाज़ार में बेचना। मैं पिछले कुछ सालों से इनके कई लोगों से अलग अलग जगह मिला जैसे इस साल एक ग्रुप को ओड़ीशा के नुआपाड़ा ज़िले के उद्द्यानबंध गाँव में, एक टोली को रायगड़ ज़िले के धरमजयगड़ में और इस टोली को कल छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव में । / सभी फोटो और आलेख पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर
All pix by Purusottam Singh Thakur