---- मुकेश कुमार कमार, स्कूल
त्यागी
# पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर,


छत्तीसगढ़ के एक अति पिछड़ा हुआ जनजातियों में कमार
जनजाति भी शामिल है। यह जनजाति शिक्षा के क्षेत्र में भी पिछड़ा हुआ है। सरकर की
मानें तो उनके शिक्षा के लिए हर तरह की सुविधा उपलब्ध है। पर इसके बावजूद बहुत से
कमार बच्चे स्कूल त्यागी क्यों हैं ?
यह सवाल क्यों न हम ऐसे ही एक युवक से जानाने की
कोशिश करते हैं जो खुद एक ड्रॉप आउट या कक्षा त्यागी है । उसका नाम मुकेश कुमार
कमार है और उम्र है 27 साल । ड्रॉप आउट
होने के बाद 2013 में ओपन स्कूल परीक्षा से वह 10 वीं पास किया और अब वह ओपन स्कूल
परीक्षा के लिए १२ वीं के लिए तैयारी कर रहा है ।

मुकेश का घर धमतरी ज़िले के मशान डबरा गाँव में है।
गाँव में 40 घर है और आबादी है 156 और सभी कमार समुदाय से हैं।
गाँव में प्राथमिक शाला है सो मुकेश यहाँ 5 वीं तक
पढ़ा उसके बाद वह 8 वीं तक भोथली में पढ़ाई की । पर उसके बाद उसे स्कूल छोडना पड़ा।
उसके दोस्त चैतूराम, शुकरु, नंदकु सभी शाला त्यागी हैं।
जब हमने पूछा “ क्यों छोड़ा ? ” तो मुकेश ने कहा “ गरीबी के चलते। पहन के स्कूल जाने के लिए कपड़े नहीं
थे, पुस्तक, कॉपी, पेन खरीदने के लिए पैसा नहीं था। उसके बाद बस इधर उधर घूमते फिरते रहते
थे। ”
मुकेश लोग 3 भाई और 2 बहन हैं।
“ मनोज तो पहली के बाद स्कूल छोड़ दिया था, बहन चम्पा 6 वीं तक पढ़ी और आगे नहीं पढ़ पाई । अब एक छोटा भाई संजय पहली
में है और छोटी बहन आंगनबाड़ी जाती है। ” मुकेश ने जानकारी दी।
उसने आगे कहा, “ जब की माँ फूलमती
और बहन जलाऊ लकड़ी जंगल से लाकर बेचने जाते हैं, और एक तरह से
उनकी कमाई से ही परिवार चल रहा है। पिताजी आज लकड़ी बेचने कम ही जा पाते हैं। ”
" हम साथियों का एक बैंड पार्टी है, इस बार एक काम मिला था और करीब छ हज़ार रुपये मिले थे, हम 8 लोग हैं आपस में पैसा बांटलेते हैं और बाकी समय कोई दूसरा काम कर
लेता हूँ जिस से 5 सौ हज़ार रुपये महीने कमा लेता हूँ जिस से परिवार को सहयोग हो
जाता है।"
हमने पूछा, आप लोगों को सरकार कई सारी सुविधा दे रही
है, हॉस्टल भी है , फिर भी आप लोग पिछड़े हुए क्यों हैं और शिक्षा के क्षेत्र
में भी बच्चे आगे पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। “इसकी वजह गरीबी है। चावल के सिवाय
सरकार की दूसरी योजना यहाँ नहीं पहुंचती है। गाँव में 5 वीं तक स्कूल है उतना तो
पढ़ ले रहे हैं आगे बाहर जाके नहीं पढ़ पाते। अभी गाँव का एक ही बच्चा हॉस्टल में है, ज्यादातर जाना नहीं चाहते। ”
कमार बच्चों के पढ़ाई के लिए सरकार को क्या करना चाहिए
ताकि वह स्कूल त्यागी ना बनें तो आप क्या कहेंगे ?
“ जैसे मशान
डबरा में प्राथमिक शिक्षा के लिए स्कूल है। माध्यमिक शाला यहाँ से 4 किमी दूर
भोथली में है। जहां हरदिन पैदल जाना आना मुश्किल है। और हम लोग आने जाने के लिए
साइकल भी खरीद नहीं सकते इस लिए या तो सरकार को गाँव में स्कूल खोलना चाहिए या 5
वीं के बाद सरकार की ओर से लड़के लड़कियों दोनों को साइकल मिलना चाहिए।
उन्होने आगे कहा की “ अगर सरकार पढ़ाना चाहती है तो, कमार बच्चों को जहां तक वह पढ़ना चाहते हैं वहाँ तक उनको पुस्तक, कॉपी,
पेन पेंसिल भी मिलनी चाहिए क्योंकि माँ-बाप यह सब नहीं खरीद सकते।
मध्यान्ह भोजन आगे भी मिलनी चाहिए क्योंकि कमार
बच्चों के पास पैसा तो होता नहीं की वह कुछ खरीद कर खा लें, और घर में भी यह संभव
नहीं की खाना लेके जा सकें। और अगर मध्यान्ह भोजन नहीं देंगे तो वे निश्चित तौर पर
दोपहर में वापस आजाएंगे। आजाते हैं । ”
तो आप को लगता है की आने वाले 5/10 साल में आपके गाँव
में बदलाव आसकता है ?
“ बच्चे आगे अगर पढ़ पाएंगे तो बदलाव आसकता है। हमारे पास
कुछ भी नहीं है, अगर सरकार हमें ज़मीन देती, काम देती तो हमारा अच्छा घर होता, साफ
सुथरा होता, हमें बदलना पड़ता । हमारे पास पैसे होते, संसाधन होते तो रहन सहन भी बदल
जाते। हमारे माँ-बाप भी पढ़ाते और हम भी पढ़ लिख के बड़े होते। और जैसे की नौकरी के लिए
सरकारी दफ्तरों में पैसे मांगते हैं वह भी हम दे पाते, अभी पैसे नहीं होता है
इसलिए नौकरी भी नहीं मिलती है। अभी क्या है, जंगल में रहते हैं, जलाऊ लकड़ी एक दिन
काटते हैं, एक दिन बेचने जाते हैं, जो पैसा कमाते हैं वह खाने-पीने तक ही होता है,
बस खाते पीते हैं और दिन रात कट जाता है। हाथ में एक पैसे का भी बचत नहीं होता है
तो आगे के बारे क्या सोचें और कैसे सोचें ? ”
इस तरह से मुकेश ने अपने घर,समाज,समुदाय और अपने
सरकार के बारे में अपना समझ और अनुभव को साझा किया।
आप को इतने साल के बाद यह कैसे लगा की अब कोशिश करनी
चाहिए ?
“ घर के और गाँव के हालत देख कर लगता है की हम जंगल
पर आश्रित हो कर कितने दिन रहेंगे ? ”
आपके दूसरे साथी को आप नहीं बोलते जो पढ़ाई छोड़ चुके
हैं वह आप जैसे पढ़ें ?
“ बोलता हूँ पर वे समझते ही नहीं। पर मुझे मालूम है, मैं
यहाँ अगर टीचर बनूँगा तो यहाँ बदलाव आसकता है। मैं खुद कमार हूँ, कमार भाषा जानता
हूँ, कमार भाषा में समझा सकता हूँ। क्योंकि जिस हिन्दी या छत्तीसगढ़ी में स्कूलों
में पढ़ाई जाती है वह हम लोग बहुत कठिन परिश्रम से समझते हैं। हमारे यहाँ बच्चे पहले
छत्तीसगढ़ी बोलना नहीं जानते । हमारे सर लोगों ( स्थानीय शिक्षकों ) की बातें कुछ
बच्चे समझते हैं बहुत सारे बच्चे समझ नहीं पाते। समझ भी जाते हैं तो बोल नहीं
पाते।
और मैं अगर टीचर बनूँगा तो मुझे देखकर गाँव के दूसरे
लोग भी यह सोच सकते हैं की हमारे बच्चे को भी ऐसा बनाएँगे । क्योंकि अभी जब पिछले
बार कोई बाहर से आया था तो एक महिला जो शराब पी थी वह चिल्ला के बोल रही थी, मुकेश
इतना पढ़ा है क्या फायदा ? उसे तो अभी तक कोई नौकरी नहीं मिली? तो हमारे बच्चों को
पढ़ाके क्या करेंगे ? लेकिन जब मैं काम करूंगा तो इन्हें एक उदाहरण मिल जाएगा।”

