शनिवार, 14 जनवरी 2017

“ मैं शिक्षक बनना चाहता हूँ ताकि कमार बच्चों को कमार भाषा में पढ़ाऊंगा, जिस से बदलाव आएगा ”


---- मुकेश कुमार कमार, स्कूल त्यागी 
# पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर,



छत्तीसगढ़ के एक अति पिछड़ा हुआ जनजातियों में कमार जनजाति भी शामिल है। यह जनजाति शिक्षा के क्षेत्र में भी पिछड़ा हुआ है। सरकर की मानें तो उनके शिक्षा के लिए हर तरह की सुविधा उपलब्ध है। पर इसके बावजूद बहुत से कमार बच्चे स्कूल त्यागी क्यों हैं ?
यह सवाल क्यों न हम ऐसे ही एक युवक से जानाने की कोशिश करते हैं जो खुद एक ड्रॉप आउट या कक्षा त्यागी है । उसका नाम मुकेश कुमार कमार है और उम्र है 27 साल ।  ड्रॉप आउट होने के बाद 2013 में ओपन स्कूल परीक्षा से वह 10 वीं पास किया और अब वह ओपन स्कूल परीक्षा के लिए १२ वीं के लिए तैयारी कर रहा है । 



मुकेश का घर धमतरी ज़िले के मशान डबरा गाँव में है। गाँव में 40 घर है और आबादी है 156 और सभी कमार समुदाय से हैं।
गाँव में प्राथमिक शाला है सो मुकेश यहाँ 5 वीं तक पढ़ा उसके बाद वह 8 वीं तक भोथली में पढ़ाई की । पर उसके बाद उसे स्कूल छोडना पड़ा। उसके दोस्त चैतूराम, शुकरु, नंदकु सभी शाला त्यागी हैं।
जब हमने पूछा क्यों छोड़ा ? ” तो मुकेश ने कहा “ गरीबी के चलते। पहन के स्कूल जाने के लिए कपड़े नहीं थे, पुस्तक, कॉपी, पेन खरीदने के लिए पैसा नहीं था। उसके बाद बस इधर उधर घूमते फिरते रहते थे। ”
मुकेश लोग 3 भाई और 2 बहन हैं।
“ मनोज तो पहली के बाद स्कूल छोड़ दिया था, बहन चम्पा 6 वीं तक पढ़ी और आगे नहीं पढ़ पाई । अब एक छोटा भाई संजय पहली में है और छोटी बहन आंगनबाड़ी जाती है। ” मुकेश ने जानकारी दी।
उसने आगे कहा, “ जब की माँ फूलमती और बहन जलाऊ लकड़ी जंगल से लाकर बेचने जाते हैं, और एक तरह से उनकी कमाई से ही परिवार चल रहा है। पिताजी आज लकड़ी बेचने कम ही जा पाते हैं।
" हम साथियों का एक बैंड पार्टी है, इस बार एक काम मिला था और करीब छ हज़ार रुपये मिले थे, हम 8 लोग हैं आपस में पैसा बांटलेते हैं और बाकी समय कोई दूसरा काम कर लेता हूँ जिस से 5 सौ हज़ार रुपये महीने कमा लेता हूँ जिस से परिवार को सहयोग हो जाता है।"
हमने पूछा, आप लोगों को सरकार कई सारी सुविधा दे रही है, हॉस्टल भी है , फिर भी आप लोग पिछड़े हुए क्यों हैं और शिक्षा के क्षेत्र में भी बच्चे आगे पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। “इसकी वजह गरीबी है। चावल के सिवाय सरकार की दूसरी योजना यहाँ नहीं पहुंचती है। गाँव में 5 वीं तक स्कूल है उतना तो पढ़ ले रहे हैं आगे बाहर जाके नहीं पढ़ पाते। अभी गाँव का एक ही बच्चा हॉस्टल में है, ज्यादातर जाना नहीं चाहते। ”
कमार बच्चों के पढ़ाई के लिए सरकार को क्या करना चाहिए ताकि वह स्कूल त्यागी ना बनें तो आप क्या कहेंगे ?
 “ जैसे मशान डबरा में प्राथमिक शिक्षा के लिए स्कूल है। माध्यमिक शाला यहाँ से 4 किमी दूर भोथली में है। जहां हरदिन पैदल जाना आना मुश्किल है। और हम लोग आने जाने के लिए साइकल भी खरीद नहीं सकते इस लिए या तो सरकार को गाँव में स्कूल खोलना चाहिए या 5 वीं के बाद सरकार की ओर से लड़के लड़कियों दोनों को साइकल मिलना चाहिए।
उन्होने आगे कहा की “ अगर सरकार पढ़ाना चाहती है तो, कमार बच्चों को जहां तक वह पढ़ना चाहते हैं वहाँ तक उनको पुस्तक, कॉपी, पेन पेंसिल भी मिलनी चाहिए क्योंकि माँ-बाप यह सब नहीं खरीद सकते।
मध्यान्ह भोजन आगे भी मिलनी चाहिए क्योंकि कमार बच्चों के पास पैसा तो होता नहीं की वह कुछ खरीद कर खा लें, और घर में भी यह संभव नहीं की खाना लेके जा सकें। और अगर मध्यान्ह भोजन नहीं देंगे तो वे निश्चित तौर पर दोपहर में वापस आजाएंगे। आजाते हैं । ”
तो आप को लगता है की आने वाले 5/10 साल में आपके गाँव में बदलाव आसकता है ?
“ बच्चे आगे अगर पढ़ पाएंगे तो बदलाव आसकता है। हमारे पास कुछ भी नहीं है, अगर सरकार हमें ज़मीन देती, काम देती तो हमारा अच्छा घर होता, साफ सुथरा होता, हमें बदलना पड़ता । हमारे पास पैसे होते, संसाधन होते तो रहन सहन भी बदल जाते। हमारे माँ-बाप भी पढ़ाते और हम भी पढ़ लिख के बड़े होते। और जैसे की नौकरी के लिए सरकारी दफ्तरों में पैसे मांगते हैं वह भी हम दे पाते, अभी पैसे नहीं होता है इसलिए नौकरी भी नहीं मिलती है। अभी क्या है, जंगल में रहते हैं, जलाऊ लकड़ी एक दिन काटते हैं, एक दिन बेचने जाते हैं, जो पैसा कमाते हैं वह खाने-पीने तक ही होता है, बस खाते पीते हैं और दिन रात कट जाता है। हाथ में एक पैसे का भी बचत नहीं होता है तो आगे के बारे क्या सोचें और कैसे सोचें ?
इस तरह से मुकेश ने अपने घर,समाज,समुदाय और अपने सरकार के बारे में अपना समझ और अनुभव को साझा किया।
आप को इतने साल के बाद यह कैसे लगा की अब कोशिश करनी चाहिए ?
“ घर के और गाँव के हालत देख कर लगता है की हम जंगल पर आश्रित हो कर कितने दिन रहेंगे ?

आपके दूसरे साथी को आप नहीं बोलते जो पढ़ाई छोड़ चुके हैं वह आप जैसे पढ़ें ?
“ बोलता हूँ पर वे समझते ही नहीं। पर मुझे मालूम है, मैं यहाँ अगर टीचर बनूँगा तो यहाँ बदलाव आसकता है। मैं खुद कमार हूँ, कमार भाषा जानता हूँ, कमार भाषा में समझा सकता हूँ। क्योंकि जिस हिन्दी या छत्तीसगढ़ी में स्कूलों में पढ़ाई जाती है वह हम लोग बहुत कठिन परिश्रम से समझते हैं। हमारे यहाँ बच्चे पहले छत्तीसगढ़ी बोलना नहीं जानते । हमारे सर लोगों ( स्थानीय शिक्षकों ) की बातें कुछ बच्चे समझते हैं बहुत सारे बच्चे समझ नहीं पाते। समझ भी जाते हैं तो बोल नहीं पाते।

और मैं अगर टीचर बनूँगा तो मुझे देखकर गाँव के दूसरे लोग भी यह सोच सकते हैं की हमारे बच्चे को भी ऐसा बनाएँगे । क्योंकि अभी जब पिछले बार कोई बाहर से आया था तो एक महिला जो शराब पी थी वह चिल्ला के बोल रही थी, मुकेश इतना पढ़ा है क्या फायदा ? उसे तो अभी तक कोई नौकरी नहीं मिली? तो हमारे बच्चों को पढ़ाके क्या करेंगे ? लेकिन जब मैं काम करूंगा तो इन्हें एक उदाहरण मिल जाएगा।”






पता नहीं क्यूँ गिल्टी/ग्लानी महसूस करता हूँ,

जब फ्लाइट में सफ़र कर रहा होता हूँ तब
ज़मीन पे शानदार गाडियों पे भी चलने वालों को भी देखकर
पता नहीं क्यूँ
गिल्टी/ग्लानी महसूस करता हूँ,
और जब ज़मीन पे मैं कार चला रहा होता हूँ तो
बाईक से जाने वाले लोगों को देखकर
पता नहीं क्यों
गिल्टी/ ग्लानी महसुस करता हूँ,
जब बाइक चला रहा होता हूँ तो
साइकिल पे आने जाने वालों को देखकर
पता नहीं क्यूँ
ग्लानी महसूस करता हूँ,
और जब साइकिल चला रहा होता हूँ तब
पैदल चलने वाले लोगों को देखकर
ग्लानी महसूस करता हूँ.....
उसी तरह
जब मैं फ्लैट में रहता हूँ तो
उन झुग्गिओं को देखकर
ग्लानी महसूस करता हूँ,
जब घर में भर पेट खाना खा रहा होता हूँ तो
उन भूखे लोगों के बारे में सोच कर
ग्लानी महसूस करता हूँ
और सोचता हूँ पता नहीं
इस देश में अम्बानी भी रहते हैं
और अम्बानी जैसे गिने चुने
और मुट्ठीभर लोग रहते हैं
उन्हें इस देश की जनता को देख कर
कभी ग्लानी होती भी होगी ???





बुधवार, 28 दिसंबर 2016

Garden of Foundation

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गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

गाँव से जुड़ने मोदीमाटवाडा स्कूल ने किया और एक पहल पालकों के लिए भी शौचालय का दरवाजा खोला

गाँव से जुड़ने मोदीमाटवाडा स्कूल ने किया और एक पहल
पालकों के लिए भी शौचालय का दरवाजा खोला
एक स्कूल ग्रामीणों के ज़िंदगी से किस तरह से जुड़ सकता है और अपनी ओर से क्या क्या पहल कर सकता है इसका और उदाहरण प्रस्तुत किया है छत्तीसगढ़ राज्य के कांकेर जिले के एक प्राथमिक शाला ने. उस प्राथमिक शाला का नाम है शासकीय प्राथमिक शाला मोदी-माटवाडा जो कांकेर शहर से ३ किमी दूर स्थित है.
देश के प्रधानमंत्री स्वच्छता अभियान को बढ़ावा देने के लिए तरह तरह के कार्यक्रम की ना केवल शुरूआत कर चुके हैं बल्कि देश भर में इसे लेकर कई तरह के प्रयोग भी हो रहे हैं. जिसके अंतर्गत सभी गाँव में और सब के घर शौचालय निर्माण के लिए जोरशोर से प्रयास जारी है और ऐसा ही प्रयास तक़रीबन 500 लोगों की आबादी वाली मोदी-माटवाडा गाँव में भी जारी है. इस प्रयास के चलते ज्यादातर लोगों के घरों में शौचालय का निर्माण भी हो चूका है पर कुछ के घरों में अभी भी बाकी है. दूसरी ओर जिनके घरों में शौचालय निर्माण नहीं हुआ है उनके उपर काफी दबाव है . गाँव में न केवल बड़े  बल्कि बच्चे भी उन लोगों पर नज़र रख रहे हैं जो शौच के लिए बाहर जा रहे हैं. इस समस्या से निजात पाने के लिए गाँव के प्राथमिक शाला
के प्रधान शिक्षिका अनसूया जैन ने भी हर बार की तरह इस बार भी एक पहल किया है- “ जब हम पूरे गाँव को एक परिवार मानते हैं और जब परिवार के कुछ लोगों के घर अभी शौचालय नहीं हैं तो वह बाहर क्यों जाएँ ? इसलिए हमने अपने सहयोगिओं और बच्चों के साथ बात करके यह  पहल की है. जिसके तहत यह तय किया गया है की जब तक इन लोगों के घर में शौचालय निर्माण नहीं हो पाया है तब तक वह स्कूल के शौचालय का प्रयोग कर सकते हैं. और तब से पिछले 15 दिनों से वार्ड नंबर 1 और 4 से करीब 10-15 महिलायें और पुरुष यहाँ का शौचालय का प्रयोग कर रहे हैं.”
गौरतलब है की इस स्कूल के शौचालय की साफ़ सफाई और रख रखाव देखने लायक है. इस शौचालय में ओवर हेड टैंक भी है जहाँ हर वक़्त पानी की व्यवस्था है, हाथ धोने के लिए लिक्विड साबुन का भी इंतज़ाम है !
स्कूल के और दो शिक्षिका साईरा बानो खान और अराधना चितरैया का भी सहयोग के बिना तो यह सब काम संभव ही नहीं हैं. उनका स्कूल इस साल जिले में स्वच्छ स्कूल के रूप में भी चुना गया है और राज्य में भी इस स्कूल का नाम भेजा गया है.  
मोदीमाटवाडा के सरपंच गणेश ध्रुव का कहना है- “ शौचालय निर्माण के अंतर्गत ज्यादातर शौचालय का निर्माण हो चूका है. और कुछ बाकि है जो जल्द पूरा हो जाएगा ऐसे में स्कूल के इस पहल से हमारा काम आसान हो गया है और इसके लिए हम स्कूल के आभारी हैं. और यह स्कूल और इसके शिक्षक गाँव के विकास में विशेष योगदान देते रहे हैं.”
इस तरह से इस प्राथमिक शाला की प्रधान पाठिका अनसूया जैन गाँव वालों के हर सुख दुःख में अपने आपको और स्कूल को जोड़े रखती हैं जिसके चलते गाँव वालों, पंचायत का और सबसे ज्यादा पालकों का सहयोग स्कूल को बराबर मिलता रहता है जिससे स्कूल में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लिए माहौल खुद ब खुद बन जाता है और स्कूल और गाँव एक दुसरे के विकास बराबरी के हिस्सेदार नज़र आते हैं.
# मोदी माटवाडा प्राथमिक शाला से लौटकर पुरूषोत्तम सिंह ठाकुर
साथिओं आप को अनसूया जैन और उनके स्कूल की कहानी पहले भी कई बार शेयर कर चूका हूँ और यह कई जगह प्रकाशित भी होचुका है, एक लिंक नीचे दे रहा हूँ. एक कहानी तो हमारे
“ सपनों की उड़ान पुस्तिका में भी प्रकाशित है .

बुधवार, 14 सितंबर 2016

जहां दाऊद गाता है रामचरित मानस..

जहां दाऊद गाता है रामचरित मानस..

  • 7 अप्रैल 2016
Image copyrightGETTY
छत्तीसगढ़ के धमतरी में 93 साल के दाऊद ख़ां 'रामायणी' का नाम बड़े अदब से लिया जाता है. दाऊद ख़ां रामचरित मानस का पाठ करते हैं, इसलिए उनके नाम के साथ 'रामायणी' जुड़ गया है.
जानने और चाहने वाले उन्हें प्यार से गुरुजी कहकर पुकारते हैं. सेवानिवृत्त सरकारी शिक्षक दाऊद ख़ां बहुत लोकप्रिय और कर्मठ शिक्षक रहे हैं.
वे आज भी हर सुबह नियमित तौर पर टहलने जाते हैं. बच्चे उन्हें 'चॉकलेट वाले दादा जी' कहते हैं क्योंकि वो बच्चे हों या बड़े सबको चॉकलेट देते हैं.
रामायण से उनका संबंध कब और कैसे बना, इस पर वे कहते हैं, "जब मैं शिक्षक ट्रेनिंग स्कूल में भर्ती हुआ तो मुझे वहां सालिगराम द्विवेदी और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मिले. ये दो मेरे शिक्षक थे. मुझे उनका सत्संग मिला."
वह कहते हैं, "तीन साल की ट्रेनिंग थी. तीसरे साल इलाहाबाद विश्वविद्यालय की 'रामायण रत्न' परीक्षा दी और हिंदुस्तान भर में प्रथम आया. 13 रुपए का पुरस्कार मिला. उसके बाद लोगों की दया और भगवान की कृपा से मेरा झुकाव रामायण के प्रति हो गया. इस तरह 68 साल से मैं रामचरित मानस का प्रवचन कर रहा हूँ."
दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR
प्रशिक्षण लेने के बाद दाऊद ख़ां शिक्षक बन गए. वे जिस स्कूल में भी रहे, वहां के ग्रामीणों से संबंध स्थापित किया. इसमें रामायण ने अहम भूमिका निभाई.
रामायण के ज़रिए उन्होंने स्कूल के साथ-साथ गांव के विकास के लिए भी लोगों को प्रेरित किया.
लोहरसी में तैनाती के दौरान उन्होंने गाँव वालों की मदद से स्कूल की चारदीवारी बनवाई और स्कूल में पेड़ लगवाए. उनमें से कुछ आज भी मौजूद हैं.
उन्होंने बताया, "हमने रामायण का कार्यक्रम रखा. सबको मालूम था कि दाऊद ख़ां गुरु जी आ रहे हैं, जो रामायण पढ़ते हैं. चार बार हमने रामायण पाठ किया. इसके बाद कहा कि आपके रामायण पढ़ने से कुछ नहीं होगा, बल्कि रामायण जो कहती है, वैसा आचरण करने से होगा."
दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR
इसी कार्यक्रम में उन्होंने गांव वालों से कहा कि, "स्कूल दो एकड़ में है. सुबह वहां से गोबर फेंकना पड़ता है. अगर चारदीवारी बन जाए, तो बहुत अच्छी बात हो. भगवान राम ने जहां भी कुटिया बनाई, अहाता ज़रूर बनाया."
उनकी अपील पर लोगों ने बिना मेहनताने के काम किया. ईंट और सीमेंट का दान किया. इस तरह स्कूल की छह फ़ीट उंची चारदीवारी बनी.
दाऊद ख़ां बताते हैं कि उन्हें लोगों को सहयोग की परिभाषा समझानी नहीं पड़ी. उनके मुताबिक़ अगर इंसान का आपस में प्रेम हो, तो कठिन से कठिन कार्य सरल हो जाता है.
इस तरह आठ अलग-अलग कामों के लिए उन्हें 1972 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला. तब राष्ट्रपति वीवी गिरि के बुलावे पर दाऊद दिल्ली गए और आठ दिन राष्ट्रपति के मेहमान रहे. उन्होंने राष्ट्रपति भवन में प्रवचन भी किया.
दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR
दाऊद बताते हैं, "राष्ट्रपति ने पूछा, हम आपको पुरस्कार दे रहे हैं, आप कैसा महसूस कर रहे हैं? हमने कहा, दाऊद ख़ां जगतपति से पुरस्कृत है और आज राष्ट्रपति से पुरस्कार ले रहा है."
हालांकि कट्टरपंथी मुसलमानों ने उनके रामायण पाठ पर आपत्ति जताई और उनसे यह काम छोड़ने को कहा. इस पर उन्होंने, "चलो मान लो, मैं छोड़ देता हूँ पर रामायण ने मुझे जिस तरह पकड़ लिया है, उसका क्या?"
दाउद ख़ां आज भी सक्रिय हैं लेकिन अब बहुत कम जगह रामायण पाठ करने जाते हैं.
हाल ही में वे छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग के एक कार्यक्रम में गए थे. वहां से उन्हें जो भी पैसा मिला, वह उन्होंने उस लड़की को पढ़ाई के लिए दे दिया, जो पहले उनके यहां काम करती थी.
दाऊद ख़ां ने उसे पढ़ने को प्रेरित किया था और आज वह सिविल सेवा की तैयारी कर रही है.
दाऊद खाँ रामायणीImage copyrightPURUSOTTAM SINGH THAKUR
कार्यक्रम से मिलने वाले पैसे का दाऊद ख़ां अपने लिए इस्तेमाल नहीं करते. वह अब तक 19 लोगों की पढ़ाई करवा चुके हैं.
घर में अकेले रहने वाले दाऊद पेंशन के सात हज़ार रुपए में ही गुज़ारा करते हैं. आज भी सुबह-शाम उनके घर लोगों का आना-जाना लगा रहता है, जो उनसे चर्चा के लिए आते हैं.
दाऊद कहते हैं, "इस तरह से कोई भी चीज़ असंभव नहीं संगठन में, प्रेम में. मेरे पास दो चीज़ें है, प्यार करता हूँ और लोगों को लोगों से जोड़ता हूँ."